कम सुनने और बोलने वालों की बने आवाज़ प्रशिक्षण:- बधिरता रोकथाम और निवारण कार्यक्रम में स्वास्थ्यकर्मी ट्रेंड।


"कहते हैं जो ठीक से सुन नहीं सकता, उसे बोलने में भी कठिनाई होती है। इस दोहरी बाधा को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जागरूकता के साथ अनुकरणीय कदम उठाया है"
महासमुंद। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सामान्य सुनने वाले व्यक्ति की तुलना में 25 डेसिबल सुनने की सीमा रेखा (ध्वनि की तीव्रता को मापने के लिए इकाई) या दोनों कानों में सुनने में होने वाले क्षति को बधिकता कहा जाता है। पीड़ित व्यक्ति को (एचओएच) या बहरापन भी हो सकता है। आमतौर पर, इस तरह के लोग सांकेतिक भाषा के माध्यम से ही संवाद कर पाते हैं। लेकिन, अगर इस ओर समुचित इलाज मिले तो सुधार एवं नियंत्रण काफी हद तक संभव है।
समस्या निराकरण के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अंतर्गत राष्ट्रीय बधिरता रोकथाम एवं निराकरण कार्यक्रम अंतर्गत हर संभव सेवा प्रदाय करने का लक्ष्य लिया गया है।
अवसर, जिला स्तर पर हुई कार्यशाला का रहा। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के जिला प्रशिक्षण समन्वय श्री आजूराम वर्मा से मिली जानकारी के अनुसार मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ एसपी वारे के निर्देशन व जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री संदीप ताम्रकार के मार्गदर्शन में उक्त समस्या निराकरण हेतु जिले के पिथौरा विकासखंड में चिकित्सा अधिकारियों सहित स्टाफ़ नर्स, ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजक पुरुष एवं महिला कार्यकर्ता व मितानिन एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को एक साथ प्रशिक्षित किया गया। इस दौरान राष्ट्रीय बधिरता रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए वर्ष 2006 से 2008 तक प्रथम चरण में हुई शुरुआत, ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कार्यक्रम की शत प्रतिशत केंद्र प्रायोजित योजना से लेकर वर्तमान में पांचवें स्तर पर हो रहे प्रयासों की बारीकियों के बारे में स्वास्थ्यकर्मियों को अवगत करा कर बताया गया कि कर्ण रोग किन कारणों से होते हैं और इसका इलाज किस तरह किया जाना है। प्रशिक्षण में राष्ट्रीय बधिरता रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम की रूप रेखा व ढांचे के बारे में भी विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई। रेडियोलॉजिकल संबंधी उपकरणों की उपलब्धता एवं कार्यक्रम अंतर्गत विभागीय सुविधाओं संबंधी आवश्यक दिशा-निर्देश भी जारी किए गए।
उल्लेखनीय है कि आगामी चरणों में क्रमांक 06 एवं 07 के तहत संकुल स्तर पर भी कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। इसके लिए पालकों से भी श्रवण बाधिरता के संकेतों को पहचान कर बिना किसी विलंब के चिकित्सकीय परामर्श व उपचार लेने की अपील की गई है।
नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ व कार्यक्रम के जिला नोडल अधिकारी डॉ के. गजभिये की अगुआई में हुई इस कार्यशाला में मास्टर ट्रेनर के रूप में सहा. चिकित्सा अधिकारी डॉ मनीष भार्गव, ऑडियोलॉजिस्ट कु. अर्चना तोमर एवं ऑडियोलॉजी सहायक श्री डोमार निषाद का योगदान सराहनीय रहा।

ऐसे पहचाने प्रारंभिक संकेतों और लक्षणों को
(क) वयस्कों में...
- दूसरे व्यक्तियों को स्पष्ट सुनने में परेशानी।
- बार-बार दोबारा बोलने के लिए आग्रह करना।
- ऊँची आवाज़ के साथ संगीत सुनना या टीवी देखना।
- दरवाजे की घंटी या टेलीफोन की आवाज़ सुनने में असमर्थ होना। आदि।
(ख) बच्चों में...
- बच्चा धीरे सीखता है और बोलते समय स्पष्ट उच्चारण नहीं कर पाता है।
- बच्चा दोबारा कहने के लिए बोलता है।
- बच्चा बहुत ज़ोर से बोलता है।
- बच्चा हमेशा ऊँची आवाज़ के साथ ही टीवी देखना पसंद करता है।
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