दंतेवाड़ा, 20 अक्टूबर 2020/देश के उत्तरोतर प्रगतिशील छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से 390 किमी दूर दक्षिण की ओर स्थित है जिला मुख्यालय दन्तेवाड़ा। देश की राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां भले ही उन नक्सली घटनाओं के चलते रंगती रही हो पर इसका दूसरा पक्ष वो शांति-सुकून भी है, जो यहां के सहज, सरल भोले जनमानस जो प्रकृति की अथाह संपदाओं के बीच स्वर्ग की धरा में वास कर रहे हैं। वो अटूट श्रद्धा एवं विश्वास उनकी रक्षा के लिए मां दन्तेश्वरी का आशीर्वाद ही काफी है। दन्तेवाड़ा नगरी शंखनी एवं डंकनी नदी के तट पर बसा है, इन दो नदियों के जिनके संगम पर पानी के जहां अलग-अलग रंग है यह शक्तिपीठ।
मंदिर का निर्माण 14 वीं सदी में बताया जाता है। शंखनी-डंकनी संगम तट पर माता के पद चिन्ह भी मौजूद हैं जो माता की साक्षात उपस्थिति बताने काफी है। मुख्य मंदिर के निकट ही भुवनेश्वरी माता का भी मंदिर है जो माँ दन्तेश्वरी की छोटी बहन है। समृद्ध वास्तुकला के साथ यहां की सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कृतियों की दर्शन कराती यह जगह ऐसा केन्द्र है जहां जो आये यहां विभोर हो जाता है। दन्तेवाड़ा का नाम ही माँ दन्तेश्वरी के नाम पर पड़ा है तथा काकतीय राजाओं के साथ ही बस्तर की कुल देवी मानी जाती है। अन्य मंदिरों की तरह इस मंदिर के पीछे भी कई किवदंतियां हैं। बस्तर संभाग की इस सम्मानीय आराध्य देवी पर माना जाता है कि यहां सती का दांत गिरा था।
उस युग में कई शक्तिपीठ का निर्माण हुआ इसलिए यह दन्तेश्वरी कहलाया और इसलिए नगर का नाम भी दन्तेवाड़ा पड़ा। यह 52वां शक्तिपीठ कहा जाता है। जबकि कई ग्रंथों में संख्या अधिक बतायी गयी है। मंदिर में प्रवेश के भी विधान हैं, जिसके मुताबिक यहां सिले हुए कपड़े पहनने लोगों को प्रवेश नहीं दिया जाता। अतएव सभी लोग लूंगी-धोती पहनकर ही दर्शन करते हैं। ले जाने की जरूरत नहीं है वहां उपलब्ध होता है। शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि पर्व में यहां ज्योति प्रज्वलित किए जाते हैं, यही नहीं इन दोनों नवरात्रि के साथ फागुन में 10 दिनों की फागुन मड़ई भी मनाई जाती है जिसमें लोग शामिल होते हैं। अतीत के इस मंदिर का बीच में जीर्णोद्धार भी कराया गया।
दूसरा जीर्णोद्धार जो तकरीबन 1932-33 में तब तत्कालीन महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी द्वारा कराए जाने की बात है। यदि आप दंतेवाड़ा आना चाहें तो बिल्कुल अपना स्वप्न साकार कीजिए और सिर्फ दंतेवाड़ा ही नहीं अपितु इसी जिले में बचेली एवं बैलाडीला जाकर एशिया के जाने-माने लौह अयस्क खदान जो अयस्क विशाखापट्टनम से जापान देश को ले जाई जाती है देखें। एशिया का जाना माना चित्रकूट जलप्रपात जिसे भारत का नियाग्रा कहा जाता है। इस जलप्रपात को देश में सबसे बड़ा जलप्रपात भी बताया जाता है जहां वाटरफॉल 90 फीट ऊंचा है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, दंडक गुफा, कुटुमसर गुफा एवं तीरथगढ़ जलप्रपात प्राकृतिक सौंदर्य से लदे विभिन्न वनस्पतियों ऊंचे घने जंगलों के साथ बस्तर की संस्कृति सभ्यता से रूबरू हो लीजिए। यदि आप आना चाह रहे हैं तो विशाखापट्टनम से ट्रेन रूट से जुड़ाव है जहां रेलवे की सुविधाएं हैं। वहीं वर्तमान में अभी जगदलपुर से हवाई सेवा की शुरुआत हुई है।
यहां से सड़क मार्ग से जो तकरीबन 100 किलोमीटर है आ सकते हैं दशहरा पर्व जो कि बस्तर में ऐसा पर्व होता है जिसके देश ही नहीं काफी संख्या में विदेशी सैलानी भी इसके साथ ही साक्षी बनते हैं छत्तीसगढ़ कला जगत में मां दंतेश्वरी देवी पर कई सेवा जस गीत ओं का निर्माण हुआ है जो काफी लोकप्रिय हुए हैं कोरोना काल के बावजूद नियमों के मुताबिक तैयारियां की गई है भक्तों की इस बार माता के लाइव दर्शन सोशल मीडिया के द्वारा कराया जा रहा है मंदिर परिसर के बाहर एलईडी स्क्रीन की व्यवस्था की गई है भक्तगण यहीं से माता के दर्शन का संतुष्ट हो रहे हैं।

