रायपुर 2 अक्टूबर(छत्तीसगढ़ सेवा)/ कल एक अक्टूबर वृ़द्धजन दिवस पर मुझे बचपन में पढ़ी, बर्फ से बने ’इग्लू’ मे रहने वाले एस्किमो की  एक कहानी याद आ गई। कहानी का लब्बोलुआब ये था कि एस्किमो अपनी परंपरा के अनुसार या अकाल आदि के समय बुजुर्गाें को अंतिम समय में उनके हाल पर आइसबर्ग में छोड़ देते थे। यह परंपरा  शायद कम संसाधन, कठिन जीवन के कारण प्रचलन में रही हो ,जो अब नही है। गांव में जो परिवार ऐसा नही करता था उसे दंडित किया जाता था। लेकिन गांव में एक युवक ,प्रतिबंध के बाद भी अपने दादा जी को घर में छुपा कर रखता है। जब गांव में कुछ मुसीबत आती है तो वह दादाजी के अनुभव से गांव को बचाता है। उसके बाद से वृद्धों को भी परिवार के साथ रहने दिया जाने लगता है। 


सार यह है कि बुजुर्गाें का अनुभव ,उनकी सीख हमेशा हमारी राह आसान करती है। कल वृ़द्धजन दिवस पर हमें यह प्रण लेना चाहिए कि कोरोना के इस युग में बुजुर्गों की खातिर, क्योंकि आज सबसे अधिक वल्नरेबल वही हैं, हम कुछ उपाय ऐसे अवश्य करेंगे जो उन्हे तो सुरक्षित रखेंगे ही ,समाज भी सुरक्षित और स्वस्थ रहेगा। उनकी खातिर क्या हम आज मास्क नही पहन सकते, फिजीकल डिस्टेंसिंग नही रख सकतेघ्  


बस कुछ बातों को यदि गांठ बांध लें कि अभी कुछ दिन कोई सोशल गेदरिंग नहीं, दोस्तों ,नातेदारेां से प्रत्यक्ष न मिलकर  वीडियो काल करना,बिना मास्क लगाए घर के बाहर कदम नहीं रखना,मास्क को गले में नही लटकाना वरन सही तरीके से नाक और मुंह को ढंकना ,हाथ साबुन पानी से साफ करते रहना। इन सबसे सयानों का साया भी हम पर रहेगा और अपनों का साथ भी। क्या आप इतना भी नहीं कर सकतेघ्