कोरबा : आचार्य श्री गौर गांगुली जी का सौंवा जन्मदिन आत्मशुद्धि दिवस के रूप में मनाया गया.. वर्ष 1996 में कुसमुण्डा में हुआ था उनका आगमन.. जाने कौन हैं स्वतंत्रता सेनानी श्री गौर.

*छत्तीसगढ़ सेवा न्यूज कोरबा से द्वारिका यादव की रिपोर्ट *
कुसमुण्डा क्षेत्र के नेहरू नगर ऑफिसर कॉलोनी के पीछे स्थित भव्य, मनमोहक व हरियाली से आच्छादित विवेकानंद सत्संग काली मंदिर प्रांगण में आचार्य श्री गौर गांगुली महराज जी सौंवा जन्मदिन आत्मशुद्धि दिवस के रूप में मनाया गया। श्री आचार्य जी के जन्मदिन को आत्मशुद्धि दिवस के रूप भारत के प्रायः सभी जगहों पर जंहा उनके भक्त अनुयायी हैं वहाँ मनाया गया।आचार्य श्री गौर गांगुली महराज जी का जन्म 14 दिसम्बर 1920 को कलकत्ता के एक राजघराने में हुआ, प्राथमिक शिक्षा उनकी रवींद्रनाथ टैगोर जी के द्वारा हुई, उसके बाद आगे पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इंग्लैंड गए, वँहा उच्च डिग्री हासिल कर वापस भारत आये, उस समय भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत थी, अंग्रेजो के शासन काल में भर्ती होकर अंग्रेज अफसर बन गए, परन्तु अंग्रेजो द्वारा भारतीयों पर हो रहे जुल्म व अत्याचार को देख कर उन्होंने नॉकरी छोड़ने का फैसला लिया और भारतीयों के समर्थन में उतर आए, अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, जिससे नाराज होकर अंग्रेजो ने इन्हें सन 1942 में फांसी देने की सजा सुनाई। इकत्फाक से फांसी के दो दिन पूर्व इन्हें सजा से बरी कर दिया गया। सजा के दौरान जेल में इन्हें स्वामी जी के दिव्य दर्शन हुए, इनके आधारीय गुरु स्वामी विवेकानंद जी हैं, जेल से बाहर आकर इन्होंने खुलकर भारत को आजाद कराने में अपना समर्थन दिया। भारत जब आजाद हुआ तो इन्हें भारत सरकार में होम सेक्रेट्री के पद पर नियुक्त किया गया। होम सेक्रेटरी रहते हुए इनकी पोस्टिंग त्रिपुरा में हुई, वहाँ इन्होंने देखा कि नारी जाति पर बहुत अत्याचार होते है , इन्होंने वँहा एक सत्संग बनाया विवेक आनन्दित सत्संग जिसका अर्थ होता है विवेक के आनन्द का सत्संग उनका कहना था की स्त्रियां नारियां देश को आगे बढ़ सकती है तो वही हमे भी आगे ले जा सकती है। त्रिपुरा क्षेत्र उस समय आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र था वहाँ उन्होंने स्त्रियों के लिए रोजगार मुहैया करवाये, उन्हें शिक्षा दीक्षा दी। इस प्रकार से वे सत्संग के क्षेत्र में आगे बढ़ते गए। भारत के अलग अलग स्थानों में उन्होंने आनन्दित सत्संग भवन का निर्माण करवाया। इनका मुख्य आश्रम अगरतला- त्रिपुरा के हपनिया इलाके में स्थापित है। जंहा उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण बिताए और वही लगभग वर्ष 2002 में इन्होंने समाधि ली और पंचतत्व में विलीन हो गए।

इस दौरान वर्ष 1996 में इनका आगमन कुसमुण्डा क्षेत्र में हुआ था, यहाँ भी उन्होंने आनन्दित सत्संग मंदिर को स्थापित किया, कुसमुण्डा क्षेत्र में रहने वाले उनके अनुयायियों ने वर्ष 1998 में उनका मंदिर यँहा बनवाया, उनकी मूर्ति भी बनवाई और उनका कलश भी स्थापित किया, तब से प्रतिवर्ष 14 दिसम्बर को आचार्य जी के जन्मदिन को आत्मशुद्धि दिवस के रूप में मनाने लोग इकट्ठे होते हैं।

कुसमुण्डा क्षेत्र में ही करीब 150 लोगो ने उनके द्वारा दी गयी शिक्षा दीक्षा को ग्रहण किया, पूरे देश मे उनके हजारो लाखो अनुयायी है। उन्होंने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, परतुं उन्होंने ताउम्र स्वतंत्रता सेनानी पेंशन नही लिया,इसके अलावा जब ये सरकारी नॉकरी में भी थे तब भी ये मात्र 2 रुपये तनख्वा लेते थे। गुरु जी राजघराने से आते थे विपिन विहारी गांगुली इनके दादा जी थे। गुरु की कभी भी पैसों को अहमियत नही दिए हमेसा दुसरो के दुख को अपना दुख मानकर चले। आज वे नही है पर समाज सेवा और समाज के उत्थान लिए कार्य करने की उनकी सोच सदैव उनके अनुयायियों में जीवित है।

यहाँ आपको बताना जरूरी है कि आत्मशुद्धि का तातपर्य यह है कि प्रभु हमसे जाने अनजाने में जो भी गलतियां हुई उसकी पुनरावृत्ति न हो और आगे हमे सद्बुद्धि मिले और हम समाज सेवा करते हुए समाज की सुख समृद्धि के लिए हमेसा कार्य करें। कुसमुण्डा क्षेत्र में ठीक इसी तरह से सुंदर कार्य्रकम का आयोजन कोविड 19 के नियमो का पालन करते हुए किया गया, प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी 14 दिसम्बर को नववर्ष कैलेंडर का विमोचन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगो को इस कैलंडर को दिया गया। आज के इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से पी रामाराव, शंभु सिंह, लेखराज पलेरिया, गौतमी रामाराव, श्वेता सिंह, लक्ष्मी उपाध्याय, डीपी भट्ट, संजय कुम्भकार, संदीप भट्टाचार्य उपस्थित रहे

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