धर्मान्तरण कर खुद को आदिवासी बताकर लाभ उठाने वालों के खिलाफ आदिवासी समाज एकजूट सौंपा ज्ञापन

 

छुरा गरियाबंद छत्तीसगढ़ सेवा न्यूज़ के लिए रामकुमार यादव कि रिपोर्ट

छुरा--धर्मान्तरित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची  से हटाकर उन्हें दिये जाने वाला आरक्षण समाप्त करने करने हेतु महामहिम राष्ट्रपति के नाम अपर कलेक्टर जे आर चौरसिया को ज्ञापन सौपा, धर्मान्तरित जनजातियों को आरक्षण सुविधायें दिये जाने के विरुद्ध तत्कालीन बिहार (वर्तमान झारखंड)  के जनजाति नेता एवं लोकसभा सदस्य/केन्द्रीय मंत्री स्व.कार्तिक उरांव जी द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी को 1970 में एक आवेदन दिया गया था। इस बात को 50 वर्ष पुरे हो चुके हैं। जनजाति समाज की अवस्था को देखकर उन्हें जो पीड़ा हुई उसे व्यक्त हेतु उनके द्वारा   "20 वर्ष की काली रात"  नामक पुस्तिका भी लिखी गई थी ,उस आवेदन को ना लोकसभा के पटल पर रखा गया था, ना ही उसको खारिज किया था, बल्कि उसको ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 235 लोकसभा सदस्यों के हस्ताक्षर से युक्त उस आवेदन के सम्बन्ध में आज स्व.कार्तिक उरांव जी के जन्म दिवस के अवसर पर आपश्री के माध्यम से सरकार को पुनः याद दिलाना आवश्यक हो गया है ,वह आवेदन 1967 के अनुसूचित जाति/जनजाति आदेश (संशोधन)  विधेयक की जे.पी.सी. की अनुशंसा के  समर्थन में किया गया था। उक्त आवेदन निम्नलिखित वाक्यों को संशोधन के रूप में जोड़ने का प्रस्ताव रखा था  - वह इस प्रकार थी: -



"(2अ)  कंडिका 2 में निहित किसी बात के होते हुये भी कोई भी  कोई भी व्यक्ति जिसने जनजाति आदिमत तथा विश्वासों का परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जाएगा। (पृष्ठ 29,पंक्ति 38 की अनुसूची कंडिका (2अ)। 

इस प्रकार का एक संशोधन 1950 में अनुसूचित जातियों के संबंध में किया गया वह इस प्रकार था- "3 कंडिका 2 में निहित किसी बात के होते हुए कोई भी व्यक्ति सिख या हिंदू धर्म को छोड़कर अन्य कोई धर्म ग्रहण करता हो वह अनुसूचित जाति का नहीं समझा जाएगा। 

भारतीय अधिनियम 1935 के अंतर्गत भारतीय ईसाई की परिभाषा में यह कहा गया है कि भारतीय ईसाई वह होगा जो कोई भी ईसाई पंथ को मानता हो और यूरोपीय या आंगलो- इंडियन हो। इसके अनुसार अनुसूचित जाति जनजाति से जब एक व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है, स्वभाविक रूप से वह व्यक्ति भारतीय ईसाई की श्रेणी में आएगा अतः उसको किसी भी प्रकार की आरक्षण की सुविधाएं देना और असंवैधानिक माना  जाएगा ,वास्तविक जनजातियों के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ जनजाति सुरक्षा मंच वर्षों से लड़ते आया है। अभी तक बहुत से सुविधाओं का धर्मान्तरित लोगों द्वारा उपभोग किया जाता रहा है जो आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से वास्तविक जनजातियों से तुलना में काफी कुछ अच्छी स्थिति में हैं। जनजाति सुरक्षा मंच यह मांग करता है कि काफी विलंब हो चुकने के बावजूद ऊपर बताए गए दिशा में संशोधन करना अत्यंत आवश्यक है,इस संबंध में जनमत संग्रह करने हेतु जनजाति सुरक्षा मंच ने 2015 में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया था जिसमें देशभर के 18 वर्ष के ऊपर के आयु 27.67 लाख जनजाति  लोगों ने हस्ताक्षर किया। स्व. जगदेव राम उरांव जी स्व.दिलीप सिंह भूरिया जी एवं श्रीमती अनुसूया जी उइके ( तत्कालीन राज्यसभा सदस्य एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ) के नेतृत्व में देशभर  के जनजाति नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को मिलकर यह जनमत संग्रह का आवेदन सौंपा था। पर हमें निराश करते हुए 27.67 जनजातियों लोगों की मनोकामना न्यायोचित मांग को संज्ञान में लेने या आवश्यक कदम उठाने का कोई प्रयास दिखाई नहीं दिया, लोकसभा के एक सदस्य के द्वारा इस विषय को उठाने का सराहनीय कदम स्वागत करने योग्य है। देश की आजादी के 73 वर्ष बीत जाने के बावजूद आज भी धर्मान्तरित जनजातियों के लोग आरक्षण की सुविधा का भरपूर- अधिकतम-अनुचित लाभ उठा रहे है,भारत के सम्मानीय राष्ट्रपति से निवेदन है कि पांच दशकों से लंबित इस समस्या के समाधान हेतु प्राथमिकता के आधार पर अनुसूचित जनजातियों के साथ हो रहे इस अन्याय को हमेशा के लिए समाप्त कर धर्मान्तरिक लोगों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाने हेतु शीघ्र ही आवश्यक संशोधन करें ताकि वास्तविक जनजाति के जीवन में 73 वर्ष के छाए हुए अंधेरे को हटाते हुए आशा की नई किरणें उनके जीवन में प्रभावित हो सके,प्रमुख

जिला-जिला संयोजक- सदाराम मरकाम ,अभिमन्यु ध्रुव, रामरतन मांझी, अमरसिंह कुंजाम, छत्तर सिंह ठाकुर, भानुप्रताप ध्रुव, चन्द्रशेखर नागेश, धर्मेन्द्र ठाकुर उपस्थित थे ।

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