कुरुद:- जिस घर मे बड़े-बुजुर्गों का सम्मान होता है,वँहा देवता भी वास करते है।घर तभी स्वर्ग से सुंदर बनता है जंहा हमारे सभी वृद्धजनो को पूजा जाता है।गणेश जी के विसर्जन के पश्चात प्रतिवर्ष 15 दिनों तक सभी घरों में स्वर्गवासी हो चुके लोगो को उनके वंशजो द्वारा तिथि अनुसार पूजा जाता है।अलग-अलग दिन तिथि अनुसार गुजर चुके लोगो का श्राद्ध करते हुए नमन किया जाता है।पितर पक्ष के शुरू होते ही सुबह से तालाबो में उनका तर्पण किया जाता है,वंही घर मे जल-धूप और फूल-माला के साथ पूजन वंदन करते हुए उनका विशेष श्राद्ध किया जाता है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ =पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात् उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धया इदं श्राद्धम् (जो श्र्द्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है।) भावार्थ है प्रेत और पित्त्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
शिक्षक मुकेश कश्यप ने समस्त पितरों को शत-शत नमन करते हुए कहा कि वैसे तो पितर पर्व से जुड़ी बहुत सारी मान्यताये और कथाएं है,पर इस महीने में पूर्वजो को दिल से ही उनका नाम लेना उनके प्रति आस्था रखना ही असली श्रद्धा होगी।साथ ही नई पीढ़ी को पित्ररो के महत्व के बारे में बताकर ही हम संयुक्त परिवार और खुशहाल जिंदगी की असली परिभाषा को साकार करते हुए उन्हें जींवन की वास्तविक संस्कृति की सीख और संस्कार का मूल्य सीखा सकते है।


